गुरुग्राम, हरियाणा का वह शहर है जो ऊंची कांच की इमारतों, बड़ी कंपनियों के दफ्तरों और दिल्ली से सटी भीड़भाड़ के लिए जाना जाता है, फिर भी इसकी चमक के पीछे कई मोहल्ले और झुग्गी बस्तियां भी बसती हैं जहां रोज़ी-रोटी की जद्दोजहद चलती रहती है। हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार यहां औसत घरेलू आय देश के सबसे ऊंचे शहरों में गिनी जाती है, जो सालाना करीब 8 से 10 लाख रुपये तक आंकी गई है, लेकिन यह आंकड़ा शहर में काम करने वाले मज़दूरों और सड़क पर रहने वालों की हकीकत से कोसों दूर है। 2011 की जनगणना में गुरुग्राम जिले में करीब 3,800 लोग बेघर दर्ज किए गए थे, और स्थानीय संगठनों का कहना है कि पिछले एक दशक में शहर के तेज़ विस्तार के साथ यह संख्या और बढ़ी है। गुरुग्राम नगर निगम कुछ रैन बसेरे चलाता है जहां रात में सिर छुपाने की जगह मिल सकती है, और गूंज जैसी संस्थाएं कपड़े, कंबल और ज़रूरी सामान बांटने का काम करती हैं। रॉबिन हुड आर्मी जैसी टीम रोज़ रात बचा हुआ खाना जरूरतमंदों तक पहुंचाती है, और स्माइल फाउंडेशन गरीब बच्चों और परिवारों के लिए शिक्षा व स्वास्थ्य सहायता का काम करती है। सर्दियों में तापमान अचानक गिर जाता है और बारिश में भी हालात मुश्किल हो जाते हैं, इसलिए शेल्टर और मदद केंद्रों की जानकारी रखना यहां जिंदा रहने के लिए ज़रूरी है। अगर तुम इस वक्त सड़क पर हो, तो जान लो कि तुम अकेले नहीं हो, और यह शहर जितना बेरहम दिखता है, उतने ही लोग यहां चुपचाप मदद का हाथ भी बढ़ाते हैं।
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