मुक्तसर पंजाब का एक ऐतिहासिक और कृषि-प्रधान शहर है, जहां गुरु गोबिंद सिंह जी की लड़ाई की यादें आज भी गलियों और गुरुद्वारों में जिंदा हैं। यह कोई बड़ा भागदौड़ भरा महानगर नहीं, बल्कि एक अपेक्षाकृत छोटा ज़िला मुख्यालय है जहां लोग अक्सर एक-दूसरे को पहचानते हैं और मुश्किल वक्त में मदद देना यहां की पुरानी आदत है। 2011 की जनगणना, जो भारत में बेघर आबादी का सबसे ताज़ा सरकारी आंकड़ा है, के मुताबिक पूरे पंजाब राज्य में करीब 26,000 लोग बेघर दर्ज किए गए थे; मुक्तसर जैसे छोटे ज़िलों का अलग आंकड़ा सार्वजनिक तौर पर मौजूद नहीं है, पर स्थानीय हकीकत यही है कि सर्दियों में यहां भी कई लोग स्टेशन और बाज़ार के आसपास रात गुज़ारते हैं। ग्रामीण पंजाब के सर्वे बताते हैं कि एक औसत परिवार यहां सालाना करीब 1.8 से 2 लाख रुपये कमाता है, लेकिन दिहाड़ी मजदूरों और बेघर लोगों के लिए यह रकम बहुत दूर की बात है। श्री मुक्तसर साहिब के गुरुद्वारों का लंगर हर दिन बिना किसी भेदभाव के खाना खिलाता है, डिस्ट्रिक्ट रेड क्रॉस सोसाइटी मुक्तसर ज़रूरतमंदों को कंबल और बुनियादी दवाइयां देने की कोशिश करती है, और नगर परिषद मुक्तसर की रैन बसेरा योजना ठंड के मौसम में रात बिताने की जगह देती है। अगर आप इस वक्त अकेले या मुश्किल हालात में हैं, तो याद रखिए—यह शहर छोटा ज़रूर है, पर यहां की सेवा भावना बड़ी है, बस मदद मांगने में संकोच मत कीजिए।