प्रयागराज, जिसे लोग अब भी इलाहाबाद के नाम से पुकारते हैं, गंगा-यमुना के संगम पर बसा एक पुराना, भीड़भाड़ वाला और धार्मिक रूप से जीवंत शहर है, जहाँ मेलों के दिनों में लाखों लोग आते हैं पर बाकी साल यह एक शांत, पढ़ाई-लिखाई और प्रशासनिक कामकाज वाला शहर बना रहता है। यहाँ ज़्यादातर परिवारों की औसत मासिक आमदनी बहुत सीमित है, उत्तर प्रदेश के हालिया सर्वेक्षणों के मुताबिक़ शहरी परिवारों की औसत आय लगभग बीस से पच्चीस हज़ार रुपये प्रति माह के आसपास ठहरती है, यानी यहाँ ज़्यादातर लोग खुद भी संघर्ष कर रहे होते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार इलाहाबाद जिले में करीब चौदह हज़ार लोग बेघर दर्ज किए गए थे, और नगर निगम के हालिया आँकड़े बताते हैं कि यह संख्या मेला और सर्दी के मौसम में और बढ़ जाती है। संगम के आसपास और सिविल लाइंस, कटरा जैसे इलाकों में रात गुज़ारने वालों के लिए नगर निगम के रैन बसेरे कुछ राहत देते हैं, वहाँ छत और कंबल मिल जाता है। मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी का यहाँ एक घर है जो बीमार और लाचार लोगों की देखभाल करता है, और सुलभ इंटरनेशनल की सुविधाएँ शहर में साफ़-सफ़ाई और शौचालय की व्यवस्था में मदद करती हैं। भूख लगे तो कुम्भ मेला क्षेत्र और बड़े मंदिरों-मस्जिदों के पास अक्सर मुफ़्त भंडारे चलते रहते हैं, खासकर शाम के वक्त। यह शहर सख्त है पर बेजान नहीं, यहाँ लोग एक-दूसरे की मदद करना जानते हैं, इसलिए हिम्मत मत हारना, आज की रात भी निकल जाएगी और कल थोड़ी उम्मीद ज़रूर लेकर आएगा।
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