भोपाल, झीलों का शहर, अपने पुराने और नए हिस्सों के अनोखे मेल के लिए जाना जाता है — एक तरफ पुरानी हवेलियाँ और बाज़ार, दूसरी तरफ चौड़ी सड़कों वाला आधुनिक इलाका, और बीच में बड़ी झील शहर को साँस लेने की जगह देती है। यहाँ ज़िंदगी की रफ़्तार दिल्ली-मुंबई जैसी तेज़ नहीं, पर मेहनत करने वालों के लिए मौके कम भी नहीं। हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार भोपाल में औसत पारिवारिक वार्षिक आय लगभग 2.5 लाख रुपये आँकी गई है, यानी बहुत से परिवार खुद भी बहुत कम मार्जिन पर गुज़ारा करते हैं। 2011 की जनगणना में भोपाल ज़िले में करीब 4,000 लोग बेघर दर्ज हुए थे, और शहर बढ़ने के साथ यह संख्या असल में और बड़ी होने की आशंका जताई जाती है। ठंड और बरसात की रातों में नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे रैन बसेरों में शरण मिल सकती है, और आशा किरण जैसे आश्रय केंद्र बुज़ुर्गों व बेसहारा लोगों को छत देने का काम करते हैं। दिव्य अमृत फाउंडेशन जैसी संस्था खासकर मानसिक रूप से बीमार और सड़क पर रहने वाले बेसहारा लोगों की मदद में जुटी रहती है, वहीं मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद ग़रीब और ज़रूरतमंद तबकों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने में सहयोग करती है। अगर तुम इसे पढ़ रहे हो, तो याद रखना — यह शहर तुम्हें अजनबी नहीं समझता, बस एक रात, एक वक्त की रोटी और थोड़ी हिम्मत माँगता है, और वह तुम में पहले से मौजूद है।
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